मंगलवार, 29 मई 2018

अकेला, कल मुझे मज़धार में जो छोड़ आये थे

अकेला, कल मुझे मज़धार में जो छोड़ आये थे,
ज़रा देखो, उन्हें   बातें  बनाना   भी  नहीं आता

                        - विनोद 'निर्भय'

मंगलवार, 22 मई 2018

यहाँ तो पीठ पीछे लोग क्या-क्या कह गुज़रते हैं


                     



यहाँ तो पीठ पीछे लोग क्या-क्या कह गुज़रते हैं
मुझे अफ़वाह को दिल से लगाना ही नहीं आया


                            - विनोद निर्भय 

दुनिया की इस मूर्ति को, देखा करके ग़ौर


                    "कुण्डलिया"

दुनिया  की   इस  मूर्ति   को ,देखा करके ग़ौर
पहले तो कुछ और थी, लेकिन अब कुछ और
लेकिन  अब कुछ और दलाली, लालच, धोखे
गीदड़   फेंके    जाल, शेर   का   रस्ता   रोके
सम्बन्धों   का  तौल, करे  बनकर  के  बनिया
उतनी  सीधी नहीं, कि जितनी दिखती दुनिया


                             - विनोद निर्भय 

शनिवार, 19 मई 2018

विज्ञ-विवेका कह गये, ऊँची रक्खो सोच


               "कुण्डलिया"


विज्ञ-विवेका  कह  गये ,ऊँची  रक्खो  सोच
एक  लक्ष्य  लेकर  बढ़ो, बाकी  फेंको  नोच
बाकी  फेंको   नोच,लोच  मत रक्खो मन में 
निर्भयता   का फूल ,तभी खिलता जीवन में 
लक्ष्यहीन   हो   राह  ,चले   जो   देखी-देखा
उसका  जीवन व्यर्थ, कह गये विज्ञ - विवेका


                         - विनोद निर्भय 

गुरुवार, 10 मई 2018

दोहा : हाथ, हाथ में थामकर

हाथ , हाथ में  थामकर  , शेर पढे दो-चार
रुठी थी तक़दीर पर, हँस दी सुनकर, यार!

रात  अंधेरी डँस रही, 'निर्भय' करे पुकार
ऐ   मेरी  तक़दीर!तू , कब  खोलेगी  द्वार

हाथ,हाथ में थाम जब, चली साथ तक़दीर
दुश्मन तो दुश्मन यहाँ, अपनो  को भी पीर

                         -विनोद निर्भय 

बुधवार, 2 मई 2018

दिलों को जोड़कर नफ़रत मिटाने की ज़रुरत है

दिलों को  जोड़कर  नफ़रत  मिटाने की ज़रुरत है 
नया हो  या   पुराना  ग़म , भुलाने की  ज़रुरत  है

कोई हिन्दू, कोई मुस्लिम यहाँ पर सिक्ख है कोई,
मगर  ख़ुद  को  यहाँ  इन्सां  बनाने की ज़रुरत है

फ़कीरों,  संत की  धरती  सदा  मुझसे यही कहती,
स्वयं   को  बूँद   से  सागर  बनाने  की  ज़रुरत  है

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...