सत्य से पड़ने लगा जब वास्ता
फ़ितरती लोगों ने बदली आस्था
लीक पर चलना मुझे भाया नहीं,
ढूंढने निकला नया इक रास्ता
बात को सुनकर किए हो अनसुनी,
क्या सुनाऊँ आपको मैं दास्ताँ
न्याय को जाऊँ बताओ मैं कहाँ,
हर जगह देना पड़ेगा नास्ता
मंजिलें विश्राम हैं औ' कुछ नहीं,
ज़िन्दगी का नाम दूजा रास्ता
गुण-चना,शरबत की बातें और थीं,
आज का फ़ैशन है मैगी-पास्ता
- विनोद निर्भय
