शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

अनेक पंथ के गहनों का है घड़ा भारत


                 " भारत "
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प्रकृति की  गोद  में खेला,हुआ  बड़ा भारत
युगों  की  याद  समेंटे,  अभी  खड़ा  भारत

कबीर , बुद्ध ,  दयानन्द , जायसी  , नानक
अनेक  पंथ  के  गहनों का  है  घड़ा  भारत

सुभाष  चन्द्र ने  ललकार  कर   पुकारा  तो,
लहू को हाथ  में लेकर  के चल  पड़ा भारत

भगत  था  नाम, क्रुर  राजतंत्र  को  खटका
उसी  की  सोच थी, चट्टान  बन अड़ा भारत

अहिंसा-सत्य का परचम उठा लिया 'निर्भय'
चला तो फिर  कभी  पीछे नहीं मुड़ा  भारत

                                           - विनोद 'निर्भय'

शनिवार, 20 जनवरी 2018

यहाँ नसीब से मिला क्या है?



               मुक्तक

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     यहाँ नसीब से   मिला   क्या   है? 
     नहीं मिला,तो फिर गिला क्या है?
     तलाश   अब   तलक   मुझे तेरी, 
     पता नहीं ये   सिलसिला  क्या है?


                  - विनोद 'निर्भय'

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई

 

                      

                            'गीत'

   

      विनोद 'निर्भय

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जीवन में फूल  बनकर  महँका  रहा है कोई
रग-रग में लहू  बनकर  लहरा  रहा  है कोई
ख़ामोश थी ये धड़कन, तन्हाईयों में गुम थी
ख़ामोश धड़कनों को  धड़का  रहा  है कोई

               ऐ आसमाँ! बता   दे, क्यूँ बूँद  गिर   रही  है 
               रितुएँ बदल   गयीं  या  यूँहीं  बरस   पड़ी हैं
               पत्थर से आज दिल को धड़का रहा है कोई
               जीवन में  फूल  बनकर  महँका रहा है कोई

ओले ये  पड़ रहे  या  बरसात  आ   रही है
दिल के चमन पे दिल  से बौछार आ रही है
मन को बसंत-रितु में बहँका  रहा   है कोई
जीवन में फूल बनकर  महँका  रहा है कोई

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बुधवार, 10 जनवरी 2018

न जाओ दूर यूँ, हमदम!अभी कुछ बात बाकी है

न जाओ दूर यूँ, हमदम!अभी कुछ बात बाकी है
हमारे   इश्क़   की   पूरी   सुहानी  रात  बाकी है
रहो   आगोश   में    यूँहीं,करुँ   दीदार   मैं   तेरा
अभी अरमां अघूरे हैं, अभी   जज़्बात   बाकी है

                             - विनोद 'निर्भय'

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...