रविवार, 31 दिसंबर 2017

कैसा ये दौर आया,कैसा है आज मंजर

विनोद 'निर्भय'
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कैसा  ये  वक़्त आया,कैसा  है  आज  मंज़र
अपने ही भोंकते हैं, अपनों के दिल में ख़ंजर
लालच की खाद इतनी पड़ने लगी है 'निर्भय'
होने लगी है अब  तो दिल की ज़मीं ही बंजर

हर लहर चोट पर चोट देती रही

विनोद 'निर्भय'
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हर  लहर  चोट  पर  चोट  देती रही
माँ मेरी  नाव को फिर भी खेती रही
रोज  काजल  लगाकरमेरे भाल पर
मुझसे  मेरी  बला  छीन   लेती रही 

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

जी रहे सभी जहाँ ज़िन्दगी उधार की



जी  रहे  सभी  जहाँ  ज़िन्दगी  उधार  की
क्या  कोई  करे  वहाँ  कामना  बहार  की

दीप  बुझ  गये  सभी,  तीरगी   सँवर  गई
नींव  पड़  गई  यहाँ  दरमियाँ   दीवार की

साहिलों  की  क़ैद  में  घुट रही है ज़िन्दगी
चाहता  था  सीखना  मौज़  तेज  धार की

अम्न  के  लिए  क़दम   खींचता रहा मगर
वक़्त   कह  रहा  करुँ, बात  आर-पार की

ज़ुल्फ़ पे ग़ज़ल लिखूँ या अदा पे नज़्म ही
जिस  क़दर  कहो  करुँ  बात  ऐतबार की

फूल   या  चमन  कहूँ  या  बहार की अदा
या   कहूँ  तुम्हें,  सनम!  चैन  बेकरार  की

                        

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

मनहरण : सीख जो बड़ों की नहीं, गुनता - समझता है

सीख जो बडों की नहीं गुनता - समझता है
वक़्त  वही   सीख उसे वक़्त पे सिखाता है

वक़्त न्यायी, वक़्त मित्र, वक़्त ही है सद्गुरू
वक़्त  ही तो आदमी को आदमी बनाता है

फूल  और शूल    बन, आम या बबूल बन
अपने-पराये   से     वो   परदा   हटाता  है

जिसका  ईलाज  नहीं  मिलता  है ढूँढने से
उसका  ईलाज वैद्य   वक़्त  ही   बताता है 

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

कब तलक यूँ मुझे आजमाएगा ग़म

कब तलक यूँ मुझे  आजमाएगा ग़म
देखना  एक दिन  हार  जाएगा   ग़म

राज दिल में  दबाकर   रखा हूँ अभी,
खोल दूँ तो   कहाँ  सर छुपाएगा ग़म

दर्द दिल  में छिपा  रोज  रखता गया,
क्या पता था कि घायल बनाएगा ग़म

कोशिशें  कर  रहा  और   होगा यही,
आज या कल सही   मुस्कुराएगा ग़म

कारवाँ   रोककर  जो खड़ा  आज है,
कल उसे  खींचकर साथ लाएगा ग़म

हाथ यूँहीं पकड़कर चलो तुम, प्रिये!
साथ पाकर हृदय भूल जाएगा   ग़म 

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

सत्य से पड़ने लगा जब वास्ता



सत्य से  पड़ने  लगा  जब वास्ता
फ़ितरती लोगों ने बदली आस्था

लीक पर चलना  मुझे भाया नहीं,
ढूंढने   निकला  नया  इक  रास्ता

बात को सुनकर किए हो अनसुनी,
क्या  सुनाऊँ   आपको  मैं  दास्ताँ

न्याय  को  जाऊँ  बताओ मैं कहाँ,
हर   जगह   देना   पड़ेगा   नास्ता

मंजिलें  विश्राम हैं औ'  कुछ  नहीं,
ज़िन्दगी    का   नाम  दूजा  रास्ता

गुण-चना,शरबत की बातें और थीं,
आज    का  फ़ैशन  है मैगी-पास्ता

                      - विनोद निर्भय  

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

तुम बिन सावन आना कैसा

तुम  बिन   सावन  आना  कैसा
फूलों  का   खिल   जाना  कैसा

इश्क़  वही  जो  रुह  को  छू ले
काया   का   छू    जाना   कैसा

मैं  तेरा    हमदम    हूँ  तो फिर,
क़ातिल    क्यूँ    बेगाना   कैसा

आज  तुम्हें    आना   ही  होगा,
मुझसे    शर्म  - बहाना    कैसा

हद  में   रहना   जिसको  भाये,
शम्मा    क्या    परवाना   कैसा

दिल हो जिसके वश में 'निर्भय'
शायर    क्या    दीवाना   कैसा

                 - विनोद निर्भय 

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

अगर संघर्ष के तल पर उतर पाओ, उतर जाओ

अगर  संघर्ष  के  तल  पर   उतर   पाओ, उतर जाओ
जो सोने की तरह  तपकर निखर पाओ, निखर जाओ

सिखाया  बाज  ने  मुझको,  अगर  शुरुआत करनी हो,
पुराने   पंख   को   अपने  कुतर  पाओ,  कुतर  जाओ

बड़ों  की   बात  पर  इतना  बिफरने  की  ज़रुरत क्या,
पड़े  जब  डाँट  हँसकर  के  गुज़र  पाओ, गुज़र जाओ

ये   जीवन   एक   अवसर   है,  इसे यूँहीं  न   जाने दो,
ज़हन में  ख़्वाब  ऊँचा  रख  सँवर  पाओ, सँवर जाओ

मैं  तुमसे ये  नहीं  कहता  कि  सागर  ही बनो 'निर्भय',
जो दरिया बन  के खेतो में बिखर पाओ, बिखर जाओ

                     
                                           - विनोद निर्भय 

हिंदी

सूर-तुलसी के संग पली हिंदी
कच्ची-पक्की डगर चली हिंदी
सोरठा, छन्द, पद, सवैया थी,
गीत-ग़ज़लों में भी ढली हिंदी

                   - विनोद निर्भय 
                   14 सितम्बर 2017

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...