विनोद 'निर्भय'
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कैसा ये वक़्त आया,कैसा है आज मंज़र
अपने ही भोंकते हैं, अपनों के दिल में ख़ंजर
लालच की खाद इतनी पड़ने लगी है 'निर्भय'
होने लगी है अब तो दिल की ज़मीं ही बंजर
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कैसा ये वक़्त आया,कैसा है आज मंज़र
अपने ही भोंकते हैं, अपनों के दिल में ख़ंजर
लालच की खाद इतनी पड़ने लगी है 'निर्भय'
होने लगी है अब तो दिल की ज़मीं ही बंजर
