शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

जी रहे सभी जहाँ ज़िन्दगी उधार की



जी  रहे  सभी  जहाँ  ज़िन्दगी  उधार  की
क्या  कोई  करे  वहाँ  कामना  बहार  की

दीप  बुझ  गये  सभी,  तीरगी   सँवर  गई
नींव  पड़  गई  यहाँ  दरमियाँ   दीवार की

साहिलों  की  क़ैद  में  घुट रही है ज़िन्दगी
चाहता  था  सीखना  मौज़  तेज  धार की

अम्न  के  लिए  क़दम   खींचता रहा मगर
वक़्त   कह  रहा  करुँ, बात  आर-पार की

ज़ुल्फ़ पे ग़ज़ल लिखूँ या अदा पे नज़्म ही
जिस  क़दर  कहो  करुँ  बात  ऐतबार की

फूल   या  चमन  कहूँ  या  बहार की अदा
या   कहूँ  तुम्हें,  सनम!  चैन  बेकरार  की

                        

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

मनहरण : सीख जो बड़ों की नहीं, गुनता - समझता है

सीख जो बडों की नहीं गुनता - समझता है
वक़्त  वही   सीख उसे वक़्त पे सिखाता है

वक़्त न्यायी, वक़्त मित्र, वक़्त ही है सद्गुरू
वक़्त  ही तो आदमी को आदमी बनाता है

फूल  और शूल    बन, आम या बबूल बन
अपने-पराये   से     वो   परदा   हटाता  है

जिसका  ईलाज  नहीं  मिलता  है ढूँढने से
उसका  ईलाज वैद्य   वक़्त  ही   बताता है 

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...