जी रहे सभी जहाँ ज़िन्दगी उधार की
क्या कोई करे वहाँ कामना बहार की
दीप बुझ गये सभी, तीरगी सँवर गई
नींव पड़ गई यहाँ दरमियाँ दीवार की
साहिलों की क़ैद में घुट रही है ज़िन्दगी
चाहता था सीखना मौज़ तेज धार की
अम्न के लिए क़दम खींचता रहा मगर
वक़्त कह रहा करुँ, बात आर-पार की
ज़ुल्फ़ पे ग़ज़ल लिखूँ या अदा पे नज़्म ही
जिस क़दर कहो करुँ बात ऐतबार की
फूल या चमन कहूँ या बहार की अदा
या कहूँ तुम्हें, सनम! चैन बेकरार की
