सोमवार, 23 जुलाई 2018

कभी ख़ुद में उलझकर

कभी ख़ुद में उलझकर,दिल चटककर के बिखर जाता 

वहीं   ख़ुद  पे अगर  आए, नया  कुछ  कर दिखाता  है 




                                   - विनोद निर्भय 

शनिवार, 21 जुलाई 2018

दुनिया भी एक तमाशा है

दुनियाँ   अब एक तमाशा है 

स्वारथ  ही जिसकी भाषा है 

हर ओर  मची  है होंड़  यहाँ, 

धोखा   है ,  दर्द -हताशा  है 


         - विनोद निर्भय 

शनिवार, 14 जुलाई 2018

हसीं एहसास बनकर के जिगर में तुम समाये हो

हसीं एहसास  बनकर के  जिगर में तुम समाये हो 

मुझे  इतना  बताओ  तो, हक़ीक़त हो कि साये हो 

मेरे   हमराज़ ! दिल में है तुम्हारे प्यार  की   ख़ुश्बू,

युगों   से   था  निरा पत्थर, शिवाला तुम बनाये हो



                          - विनोद निर्भय 

मेरी साँसों में रहते हो, जिगर में तुम समाये हो

मेरी  साँसों  में  रहते  हो, जिगर में तुम समाये हो 

मुझे ये तो  बताओ तुम, हक़ीक़त हो कि साये हो 

मेरे  मेहबूब ! मुझमें है  तेरे एहसास   की   ख़ुश्बू,

मेरा  दिल  था निरा पत्थर, शिवाला तुम बनाये हो



                      - विनोद निर्भय 

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

दिखाने को भले वो ज़ख़्म पे मरहम लगाता है

दिखाने  को भले ही ज़ख़्म पर मरहम  लगाता  है
मुझे   लाचार  जब   देखे , नहीं  फूला  समाता  है
तिकड़मी-जालसाज़ों की क़दर है आज दुनियाँ में,
खरी-खोटी  वही  सुनता  यहाँ जो सच  बताता है

                    - विनोद निर्भय 

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...