गुरुवार, 31 जनवरी 2019

फ़लक पे धुंध का मतलब.........

फ़लक  पे धुंध का  मतलब  ज़मीं  पे आग है माना, 

उठी  है  आग  तो   होगी  वजह  कोई, ज़रा  सोचो|


                           - विनोद 'निर्भय'

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

मेरा मन ट्रान्सफार्मर.......

 

" मेरा मन  ट्रांसफ़ार्मर  तो तुम्हारी  याद बिजली सी,
  हृदय में  बल्ब, मोटर,फ्रीज़ क्या-क्या ऑन रहते हैं| "


                            - विनोद 'निर्भय'

बुधवार, 16 जनवरी 2019

उद्धव-गोपी वार्तालाप


                  उद्धव संवाद 


जीव  मारा-मारा  फिरे , कभी मध्य कभी  तीरे,
जलधि  समान   प्रेम  , इस   पथ   जाओ  ना|
गये    छलपति   दूर , भूल   राग  ,  रास -  रंग,
राह देख  रात - दिन  , ख़ुद  को  सताओ  ना||
ब्रह्म  एकमात्र   सत्य , एक   मुक्ति  मार्ग  वही,
मोह - जाल त्याग बढो , ज़िन्दगी   गवाओ ना|
भेजे   यहाँ   कृष्ण  मुझे , खुल  गये भाग्य तेरे,
हित  की  बताऊँ बात ,  हँस  के उड़ाओ  ना||

                  गोपी संवाद 


गोपियाँ   अधीर   हुईं , नैन   भर   नीर  बोलीं, 
मदन - मुरारी   दिये ,  पत्र   तो   छुपाओ  ना|
मन   है  विभोर   आज , रोम - रोम  पुलकित, 
छोड़  के  प्रणय - गीत, और  कुछ  गाओ ना||
राग,तत्व,मौन , ध्यान , माया,काया  भाये नहीं,
माधो  जी ,  हमें  ये पाठ , ज्ञान के पढाओ ना|
ब्रह्मज्ञानी ,  दूर   जाओ , गाओ  कही निरगुण,
बिरह  की   नींद   हम   सोई  हैं  जगाओ ना||

                          


मंगलवार, 8 जनवरी 2019

'निर्भय' के पाँच कुण्डलिया

                         (1)

लाख   टके  की   बात  है , समझो   मेरे  यार|
धन से बस ख़ुशियाँ मिलें,मुश्किल पाना प्यार||
मुश्किल पाना  प्यार,मिले तो  कसकर पकड़ो|
पेड़  बनो फलदार , ताड़ बनकर मत अकड़ो||
सम्बन्धों   में   बात , करे  जो  हानि-नफे  की|
वो  निर्धन - नादान ,बात   है  लाख  टके  की||

                          (2)

क़ुदरत  का  दस्तूर है , पल-पल अनुसंधान|
बदसूरत-सुन्दर  सभी , क़ुदरत  के सामान|| 
क़ुदरत  के  सामान , बिना  माँगे ही मिलते|
धूप-छाँव  के  बीच, फूल  काँटों में खिलते|| 
देने   को  बेताब , नहीं   लेने   की   हसरत|
कर्मयोग का पाठ, सहज समझाती क़ुदरत||

                             (3)

दुनिया  की  इस  मूर्ति को , देखा  कर  के  ग़ौर|
पहले  तो कुछ और थी, लेकिन अब कुछ और|| 
लेकिन अब  कुछ और , दलाली, लालच, धोखे|
झूठ   बेड़ियां   डाल  ,  सत्य   का  रस्ता  रोके|| 
सम्बन्धों  का   तौल , करे   बनकर  के  बनिया|
उतनी  सीधी नहीं , कि जितनी दिखती दुनिया|| 

                          (4)

अपने को मत कोसिए,समय दशा का मूल| 
समय बिछाता फूल भी,समय चुभाये शूल||
समय  चुभाये  शूल , सिखाये  दुनियादारी| 
समय  गुरु है  यार , करो तुम ख़ातिरदारी||
मिल जाती है  राह , अगर सच्चे  हों सपने| 
समय  बताता  कौन  पराया कितने अपने|| 

                             (5)

मन  सुख-दुख का श्रोत है , मन जीवन का सार|
मन  से  मिलती  जीत  तो,मन  से  मिलती हार|| 
मन   से  मिलती हार ,  यही   गीता   भी   गाती| 
मन  के  साधक हेतु , प्रकृति  ख़ुद  राह बनाती||
जीवन करता तंज   , रंज   से   घिर  जाता  तन|
विचलित हो जब आप,स्वयं अपने  पथ  से मन||


                              ©  - विनोद 'निर्भय'


     

दिखाने को भले वो ज़ख़्म पे मरहम लगाता है



दिखाने  को भले  वो  ज़ख़्म  पे  मरहम  लगाता  है|
मुझे   लाचार  जब   देखे  , नहीं  फूला   समाता  है||

ग़मों  से  जूझता  इंसान  यूँ  जाता   निखर  अक्सर,
ज़माने  को   वही  इक दिन  नयी  राहें  दिखाता  है|

समझती क्यूँ  नहीं  कोई  बदी इतनी  हक़ीक़त  को,
ख़ुदा  ही  हर  किसी  को  ज़िन्दगी देता, मिटाता है||

वहाँ  ज़िन्दादिली से  ज़िन्दगी  जीना  सरल  है क्या,
जहाँ  हर  बात पर  हम पे कोई  तोहमत लगाता  है|

फ़रेबी-जालसाजों   की   क़दर होती  यहाँ  अब  तो,
वहीं  बेदाम  सच हर इक  क़दम पर  मात खाता है||

लिखा है मुल्क  की क़िस्मत में क्या,ये तो ख़ुदा जाने
कोई भी  सिरफिरा  ख़ुद  को यहाँ  नेता  बताता  है|

कलम है हल ,ज़मी कागज़,लहू से सींचकर 'निर्भय',
सुहाने  गीत - ग़ज़लों  की  नयी  फसलें  उगाता  है||


                   © - विनोद निर्भय


हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...