सोमवार, 1 अप्रैल 2019

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है| 
नहीं  पता तो  फिर पता क्या है||
नसीब    आपका     पढा   हमने,
कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है| 


              - विनोद 'निर्भय'

शनिवार, 23 मार्च 2019

दो तरफ हो चित वही सिक्का उछाला जाएगा

दो तरफ  हो चित वही  सिक्का  उछाला जाएगा|
और  पट   पे  फिर  मुझे  उल्लू  बनाया जाएगा||
नेकियाँ  भी  कम  नहीं   मेरी  मगर   होगा  यही,
इक कमी को खोजकर फतवा  सुनाया  जाएगा|


                 - विनोद 'निर्भय'


बुधवार, 20 मार्च 2019

सत्य नहीं जलता

भले-बुरे  सारे  अनुभव  होते   रंगों   के  जैसे   ही  
केवल एक रंग  से तो जीवन में फाग नहीं फलता 

            सात  रंग  से  मिलकर  सूरज
            रंग   -   कलश      कहलाता|  
            भीग दिव्य किरणों से जिसके 
            धन्य     जगत      हो  जाता||

दीपक से अँधियारा पिघले,कोहरा घोर नहीं छँटता
केवल एक रंग  से तो जीवन  में फाग नहीं फलता 
 
              मौसम    के   हैं    रंग   कई,
              सबका   जीवन   से   नाता|
              कोई       बर्षा      के     तो  
              कोई  गुण  बसंत  के गाता||
  
पतझड़  से न  गुज़रे  उन  वृक्षों पे  बौर नहीं लगता
केवल  एक रंग  से तो जीवन  में फाग नहीं फलता 
 
              बैठ  गया   प्रहलाद  गोद में
              नहीं    ख़ौफ़  था   मन   में|
              मगर होलिका जल जाती है
              अपने    द्वेष    अगन     में||

कहने को सन्मति जलती है,लेकिन सत्य नहीं जलता
केवल  एक रंग  से तो  जीवन  में  फाग  नहीं फलता 
 
                   

                            - विनोद 'निर्भय'


शुक्रवार, 15 मार्च 2019

मुक्तक : आँधियोंं में वही टिका होगा!

आँधियों  में  वही   टिका  होगा
जो कि बुनियाद से जुड़ा  होगा
रंग   छोड़ेगा  एक  दिन  तय हैं
धातु  पीतल का ग़र  मढा होगा


             - विनोद 'निर्भय'

शनिवार, 9 मार्च 2019

"साक्ष्य और कोरे तथ्य"

थी आज्ञा  रघुनंदन की , तो बानर दल का था आह्वान 
सीता जी का  पता  लगाने  सागर  पार  गये   हनुमान 

            किले   बीच   दैत्यों   का  डेरा, 
            थी    यौवन   पर   रात  घनेरी|
            मिले  सर्जिकल  करने  को तो 
            हनुमत  कब   करते  हैं   देरी?

बाग-बगीचे , महल - अटारी  हुए राख ,  रावण  हैरान
सीता जी का  पता  लगाने  सागर  पार  गये   हनुमान 

            जलधि कूद लंका तक ख़ुद तो 
            बानर       आ      न     पाएंगे|
            मुझको  दबी  ज़ुबां  से    झूठा 
            कह     के      हँसी   उड़ाएंगे||

पूँछ  बुझाते  आया  मन  में  सागर तट पे  यह  संज्ञान  
सीता जी का  पता  लगाने  सागर  पार  गये   हनुमान 

           सागर  तट   से    वापस  पहुँचे
           जनक   नन्दिनी   जी के  पास|
           चूड़ामणि   मांगा   विनती  कर
           उड़े     पुन:    ऊँचे   आकाश|| 

बिना साक्ष्य  देता  कब  कोई  कोरे  तथ्यों को सम्मान
सीता जी का  पता  लगाने  सागर  पार  गये   हनुमान 


                    ©    - विनोद 'निर्भय'





रविवार, 17 फ़रवरी 2019

बीन बजाये आखिर कौन ? तुम भी मौन!!

                    तक्षक मचा रहे हैं तांडव, 
                    बीन बजाये आखिर कौन
                    तुम भी  मौन...... 

             कड़े  चाक-चौबंध
             परीक्षित तो  करवाये 
             द्वार-द्वार  पर   सिद्ध
             सफेरे  भी  बैठाये

             मंदिर तक फूलों में
             छिपकर आया  कौन
             माली  मौन........... 

             जन्मेजय है  आज 
             पिता के ग़म में व्याकुल 
             सोच  रहा  वो युक्ति
             निपटने का हर माकूल

             नाग-भष्म   करने   का 
             मंत्र  उचारे   कौन 
             पूछे  मौन.......... 

             हुआ परीक्षित जैसा भारत
             शासक  जन्मेजय सा
             पाक हिंद पर श्राप और   
             तक्षक हत्यारों जैसा

             चीख-चीखकर हारी
             दर्द मिटाये  कौन ?
             घाटी मौन....... 

             पत्नी का सिंदुर लुटा
             तो  बच्चों की आशाएँ 
             पूछ रही हैं वीर शहीदों
             की लज्जित माताएँ

             बिना  लड़े  सीमा   पर 
             मरना   चाहे  कौन 
             सब हैं  मौन............    

                                        - विनोद 'निर्भय'

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

आख़िर कौन चितेरा इनका, कौन सृजन का मूल

         पर्वत , नदिया ,पक्षी , झरने , सूरज , कलियाँ , शूल|
         आख़िर कौन  चितेरा  इनका ,कौन सृजन का मूल||

         पानी-खाद  एक  सा  देते माली     को     देखा   है|
         धूप - छाँव में साथ डोलते डाली    को    देखा   है||
         फिर भी  क्यूँ बागों  में खिलते भाँति-भाँति के फूल| 
       
         जाड़े में  पड़ता  है कितना भीषण   गलन  - कुहासा|
         नल का गरम - गरम पानी देता   है   लेकिन  आशा||
         गर्मी    में    वापस   हो   जाता    पानी    कैसे  कूल|    
     
         कोयल किसे  रिझानेे ख़ातिर बोले  मोहक     वाणी|
         सुध में   किसकी  झूमें धरती पहने  चूनर      धानी||
         जाता  किस   ख़ुश्बू  से  भौरा  अपनी  हस्ती   भूल|

         सन्नाटे  में  झिलमिल नाद  बजाने     वाला     कौन|
         जुगनू   में    विद्युत   का  ताप   जगाने वाला कौन||
         जीव-जगत  के   हित   में  किसने गूथे व्यापक रुल|

                           - विनोद 'निर्भय'

   
                 

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

नये चावल सरीखी क्लिष्ट है तासीर सपनों की....

नये  चावल  सरीखी क्लिष्ठ है  तासीर  सपनों की, 

हज़म  होते  नहीं  दोनों  ज़माने  को यहाँ अक्सर|


                                   - विनोद 'निर्भय'

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

सभी करके कहाँ मिलकर पहल कोई

ग़ज़ल

सभी  करते  कहाँ  मिलकर पहल कोई, ज़रा सोचो|
किसी  की  लाज लुटती है,सजग कोई, ज़रा सोचो||  

महज़ बारह  बरस का है  ,मिला कल एक होटल में,
यही   केतल  उठाने  की  उमर   कोई , ज़रा  सोचो| 

मिलेंगे  मित्र  लाखों  पास शोहरत-ठाठ  हो जिनके,
बुरे   हालात  पे   खाता   तरस  कोई , ज़रा  सोचो||

फ़लक  पे धुंध का  मतलब  ज़मीं  पे आग  है माना, 
उठी  है  आग  तो   होगी  वजह  कोई, ज़रा  सोचो| 

मटन-दारु  थमाते  ही   कहा  मुखिया  इलेक्शन  में,
जिताने का करो फिर से   जतन  कोई , ज़रा सोचो||

गुरु  जी  यूँ    सुनाते थे  व्यथा  दौर-ए-शहादत  की,
झपकती  थी कहाँ सुनकर पलक कोई, ज़रा सोचो|

                                  - विनोद 'निर्भय'


गुरुवार, 31 जनवरी 2019

फ़लक पे धुंध का मतलब.........

फ़लक  पे धुंध का  मतलब  ज़मीं  पे आग है माना, 

उठी  है  आग  तो   होगी  वजह  कोई, ज़रा  सोचो|


                           - विनोद 'निर्भय'

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

मेरा मन ट्रान्सफार्मर.......

 

" मेरा मन  ट्रांसफ़ार्मर  तो तुम्हारी  याद बिजली सी,
  हृदय में  बल्ब, मोटर,फ्रीज़ क्या-क्या ऑन रहते हैं| "


                            - विनोद 'निर्भय'

बुधवार, 16 जनवरी 2019

उद्धव-गोपी वार्तालाप


                  उद्धव संवाद 


जीव  मारा-मारा  फिरे , कभी मध्य कभी  तीरे,
जलधि  समान   प्रेम  , इस   पथ   जाओ  ना|
गये    छलपति   दूर , भूल   राग  ,  रास -  रंग,
राह देख  रात - दिन  , ख़ुद  को  सताओ  ना||
ब्रह्म  एकमात्र   सत्य , एक   मुक्ति  मार्ग  वही,
मोह - जाल त्याग बढो , ज़िन्दगी   गवाओ ना|
भेजे   यहाँ   कृष्ण  मुझे , खुल  गये भाग्य तेरे,
हित  की  बताऊँ बात ,  हँस  के उड़ाओ  ना||

                  गोपी संवाद 


गोपियाँ   अधीर   हुईं , नैन   भर   नीर  बोलीं, 
मदन - मुरारी   दिये ,  पत्र   तो   छुपाओ  ना|
मन   है  विभोर   आज , रोम - रोम  पुलकित, 
छोड़  के  प्रणय - गीत, और  कुछ  गाओ ना||
राग,तत्व,मौन , ध्यान , माया,काया  भाये नहीं,
माधो  जी ,  हमें  ये पाठ , ज्ञान के पढाओ ना|
ब्रह्मज्ञानी ,  दूर   जाओ , गाओ  कही निरगुण,
बिरह  की   नींद   हम   सोई  हैं  जगाओ ना||

                          


मंगलवार, 8 जनवरी 2019

'निर्भय' के पाँच कुण्डलिया

                         (1)

लाख   टके  की   बात  है , समझो   मेरे  यार|
धन से बस ख़ुशियाँ मिलें,मुश्किल पाना प्यार||
मुश्किल पाना  प्यार,मिले तो  कसकर पकड़ो|
पेड़  बनो फलदार , ताड़ बनकर मत अकड़ो||
सम्बन्धों   में   बात , करे  जो  हानि-नफे  की|
वो  निर्धन - नादान ,बात   है  लाख  टके  की||

                          (2)

क़ुदरत  का  दस्तूर है , पल-पल अनुसंधान|
बदसूरत-सुन्दर  सभी , क़ुदरत  के सामान|| 
क़ुदरत  के  सामान , बिना  माँगे ही मिलते|
धूप-छाँव  के  बीच, फूल  काँटों में खिलते|| 
देने   को  बेताब , नहीं   लेने   की   हसरत|
कर्मयोग का पाठ, सहज समझाती क़ुदरत||

                             (3)

दुनिया  की  इस  मूर्ति को , देखा  कर  के  ग़ौर|
पहले  तो कुछ और थी, लेकिन अब कुछ और|| 
लेकिन अब  कुछ और , दलाली, लालच, धोखे|
झूठ   बेड़ियां   डाल  ,  सत्य   का  रस्ता  रोके|| 
सम्बन्धों  का   तौल , करे   बनकर  के  बनिया|
उतनी  सीधी नहीं , कि जितनी दिखती दुनिया|| 

                          (4)

अपने को मत कोसिए,समय दशा का मूल| 
समय बिछाता फूल भी,समय चुभाये शूल||
समय  चुभाये  शूल , सिखाये  दुनियादारी| 
समय  गुरु है  यार , करो तुम ख़ातिरदारी||
मिल जाती है  राह , अगर सच्चे  हों सपने| 
समय  बताता  कौन  पराया कितने अपने|| 

                             (5)

मन  सुख-दुख का श्रोत है , मन जीवन का सार|
मन  से  मिलती  जीत  तो,मन  से  मिलती हार|| 
मन   से  मिलती हार ,  यही   गीता   भी   गाती| 
मन  के  साधक हेतु , प्रकृति  ख़ुद  राह बनाती||
जीवन करता तंज   , रंज   से   घिर  जाता  तन|
विचलित हो जब आप,स्वयं अपने  पथ  से मन||


                              ©  - विनोद 'निर्भय'


     

दिखाने को भले वो ज़ख़्म पे मरहम लगाता है



दिखाने  को भले  वो  ज़ख़्म  पे  मरहम  लगाता  है|
मुझे   लाचार  जब   देखे  , नहीं  फूला   समाता  है||

ग़मों  से  जूझता  इंसान  यूँ  जाता   निखर  अक्सर,
ज़माने  को   वही  इक दिन  नयी  राहें  दिखाता  है|

समझती क्यूँ  नहीं  कोई  बदी इतनी  हक़ीक़त  को,
ख़ुदा  ही  हर  किसी  को  ज़िन्दगी देता, मिटाता है||

वहाँ  ज़िन्दादिली से  ज़िन्दगी  जीना  सरल  है क्या,
जहाँ  हर  बात पर  हम पे कोई  तोहमत लगाता  है|

फ़रेबी-जालसाजों   की   क़दर होती  यहाँ  अब  तो,
वहीं  बेदाम  सच हर इक  क़दम पर  मात खाता है||

लिखा है मुल्क  की क़िस्मत में क्या,ये तो ख़ुदा जाने
कोई भी  सिरफिरा  ख़ुद  को यहाँ  नेता  बताता  है|

कलम है हल ,ज़मी कागज़,लहू से सींचकर 'निर्भय',
सुहाने  गीत - ग़ज़लों  की  नयी  फसलें  उगाता  है||


                   © - विनोद निर्भय


हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...