मंगलवार, 8 जनवरी 2019

दिखाने को भले वो ज़ख़्म पे मरहम लगाता है



दिखाने  को भले  वो  ज़ख़्म  पे  मरहम  लगाता  है|
मुझे   लाचार  जब   देखे  , नहीं  फूला   समाता  है||

ग़मों  से  जूझता  इंसान  यूँ  जाता   निखर  अक्सर,
ज़माने  को   वही  इक दिन  नयी  राहें  दिखाता  है|

समझती क्यूँ  नहीं  कोई  बदी इतनी  हक़ीक़त  को,
ख़ुदा  ही  हर  किसी  को  ज़िन्दगी देता, मिटाता है||

वहाँ  ज़िन्दादिली से  ज़िन्दगी  जीना  सरल  है क्या,
जहाँ  हर  बात पर  हम पे कोई  तोहमत लगाता  है|

फ़रेबी-जालसाजों   की   क़दर होती  यहाँ  अब  तो,
वहीं  बेदाम  सच हर इक  क़दम पर  मात खाता है||

लिखा है मुल्क  की क़िस्मत में क्या,ये तो ख़ुदा जाने
कोई भी  सिरफिरा  ख़ुद  को यहाँ  नेता  बताता  है|

कलम है हल ,ज़मी कागज़,लहू से सींचकर 'निर्भय',
सुहाने  गीत - ग़ज़लों  की  नयी  फसलें  उगाता  है||


                   © - विनोद निर्भय


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...