दिखाने को भले वो ज़ख़्म पे मरहम लगाता है|
मुझे लाचार जब देखे , नहीं फूला समाता है||
ग़मों से जूझता इंसान यूँ जाता निखर अक्सर,
ज़माने को वही इक दिन नयी राहें दिखाता है|
समझती क्यूँ नहीं कोई बदी इतनी हक़ीक़त को,
ख़ुदा ही हर किसी को ज़िन्दगी देता, मिटाता है||
वहाँ ज़िन्दादिली से ज़िन्दगी जीना सरल है क्या,
जहाँ हर बात पर हम पे कोई तोहमत लगाता है|
फ़रेबी-जालसाजों की क़दर होती यहाँ अब तो,
वहीं बेदाम सच हर इक क़दम पर मात खाता है||
लिखा है मुल्क की क़िस्मत में क्या,ये तो ख़ुदा जाने
कोई भी सिरफिरा ख़ुद को यहाँ नेता बताता है|
कलम है हल ,ज़मी कागज़,लहू से सींचकर 'निर्भय',
सुहाने गीत - ग़ज़लों की नयी फसलें उगाता है||
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