मंगलवार, 8 जनवरी 2019

'निर्भय' के पाँच कुण्डलिया

                         (1)

लाख   टके  की   बात  है , समझो   मेरे  यार|
धन से बस ख़ुशियाँ मिलें,मुश्किल पाना प्यार||
मुश्किल पाना  प्यार,मिले तो  कसकर पकड़ो|
पेड़  बनो फलदार , ताड़ बनकर मत अकड़ो||
सम्बन्धों   में   बात , करे  जो  हानि-नफे  की|
वो  निर्धन - नादान ,बात   है  लाख  टके  की||

                          (2)

क़ुदरत  का  दस्तूर है , पल-पल अनुसंधान|
बदसूरत-सुन्दर  सभी , क़ुदरत  के सामान|| 
क़ुदरत  के  सामान , बिना  माँगे ही मिलते|
धूप-छाँव  के  बीच, फूल  काँटों में खिलते|| 
देने   को  बेताब , नहीं   लेने   की   हसरत|
कर्मयोग का पाठ, सहज समझाती क़ुदरत||

                             (3)

दुनिया  की  इस  मूर्ति को , देखा  कर  के  ग़ौर|
पहले  तो कुछ और थी, लेकिन अब कुछ और|| 
लेकिन अब  कुछ और , दलाली, लालच, धोखे|
झूठ   बेड़ियां   डाल  ,  सत्य   का  रस्ता  रोके|| 
सम्बन्धों  का   तौल , करे   बनकर  के  बनिया|
उतनी  सीधी नहीं , कि जितनी दिखती दुनिया|| 

                          (4)

अपने को मत कोसिए,समय दशा का मूल| 
समय बिछाता फूल भी,समय चुभाये शूल||
समय  चुभाये  शूल , सिखाये  दुनियादारी| 
समय  गुरु है  यार , करो तुम ख़ातिरदारी||
मिल जाती है  राह , अगर सच्चे  हों सपने| 
समय  बताता  कौन  पराया कितने अपने|| 

                             (5)

मन  सुख-दुख का श्रोत है , मन जीवन का सार|
मन  से  मिलती  जीत  तो,मन  से  मिलती हार|| 
मन   से  मिलती हार ,  यही   गीता   भी   गाती| 
मन  के  साधक हेतु , प्रकृति  ख़ुद  राह बनाती||
जीवन करता तंज   , रंज   से   घिर  जाता  तन|
विचलित हो जब आप,स्वयं अपने  पथ  से मन||


                              ©  - विनोद 'निर्भय'


     

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