रविवार, 21 अक्टूबर 2018
बुधवार, 26 सितंबर 2018
इस तरफ आँधी,उधर सैलाब भी : मुक्तक
इस तरफ आँधी , उधर सैलाब भी|
और नयनों में सुनहरा ख़्वाब भी||
आँख का पानी मरा है जब कहीं,
सूख जाते हैं नदी - तालाब भी|
- विनोद 'निर्भय'
सोमवार, 24 सितंबर 2018
हज़ारों जंग ऐसी जीतने से हारना बेहतर : शेेर
हज़ारों जंग ऐसी जीतने से हारना बेहतर,
विजय के बाद जिसमें हार का एहसास होता हो
- विनोद 'निर्भय'
रविवार, 5 अगस्त 2018
कहीं सूरज चमकता तो कहीं काली धटाएँ हैं
कहीं सूरज चमकता तो कहीं काली घटाएँ हैं|
यही दो ज़िन्दगी की ख़ूबसूरत सी अदाएँ हैं||
किसी के पास दौलत है, किसी के पास है शोहरत,
किसी के पास पूँजी में महज़ दोनों भुजाएँ हैं|
- विनोद निर्भय
सोमवार, 23 जुलाई 2018
कभी ख़ुद में उलझकर
कभी ख़ुद में उलझकर,दिल चटककर के बिखर जाता
वहीं ख़ुद पे अगर आए, नया कुछ कर दिखाता है
- विनोद निर्भय
शनिवार, 21 जुलाई 2018
दुनिया भी एक तमाशा है
दुनियाँ अब एक तमाशा है
स्वारथ ही जिसकी भाषा है
हर ओर मची है होंड़ यहाँ,
धोखा है , दर्द -हताशा है
- विनोद निर्भय
शनिवार, 14 जुलाई 2018
हसीं एहसास बनकर के जिगर में तुम समाये हो
हसीं एहसास बनकर के जिगर में तुम समाये हो
मुझे इतना बताओ तो, हक़ीक़त हो कि साये हो
मेरे हमराज़ ! दिल में है तुम्हारे प्यार की ख़ुश्बू,
युगों से था निरा पत्थर, शिवाला तुम बनाये हो
- विनोद निर्भय
मेरी साँसों में रहते हो, जिगर में तुम समाये हो
मेरी साँसों में रहते हो, जिगर में तुम समाये हो
मुझे ये तो बताओ तुम, हक़ीक़त हो कि साये हो
मेरे मेहबूब ! मुझमें है तेरे एहसास की ख़ुश्बू,
मेरा दिल था निरा पत्थर, शिवाला तुम बनाये हो
- विनोद निर्भय
शुक्रवार, 13 जुलाई 2018
दिखाने को भले वो ज़ख़्म पे मरहम लगाता है
दिखाने को भले ही ज़ख़्म पर मरहम लगाता है
मुझे लाचार जब देखे , नहीं फूला समाता है
तिकड़मी-जालसाज़ों की क़दर है आज दुनियाँ में,
खरी-खोटी वही सुनता यहाँ जो सच बताता है
मुझे लाचार जब देखे , नहीं फूला समाता है
तिकड़मी-जालसाज़ों की क़दर है आज दुनियाँ में,
खरी-खोटी वही सुनता यहाँ जो सच बताता है
- विनोद निर्भय
शनिवार, 23 जून 2018
हर शहादत पर पुराना मौन जारी आज भी
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हर शहादत पर पुराना मौन जारी आज भी
सैनिकों के पीठ पर चलती कटारी आज भी
''देश को झुकने नहीं दूंगा'', ये दावा आम था
पर हक़ीकत है यहाँ दावे पे' भारी आज भी
तीन सौ सत्तर हटी , ना राम मंदिर ही बना
कल मदारी थे , वही निकले मदारी आज भी
लूटकर माल्या भगा , चंपत हुए नीरव कई,
दंग हूँ मैं देखकर काला बजारी आज भी
रेप , शोषण और हत्या सुर्खियों में रोज हैं
कुछ नहीं बदला यहाँ,सब कुछ है' जारी आज भी
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हर शहादत पर पुराना मौन जारी आज भी
सैनिकों के पीठ पर चलती कटारी आज भी
''देश को झुकने नहीं दूंगा'', ये दावा आम था
पर हक़ीकत है यहाँ दावे पे' भारी आज भी
तीन सौ सत्तर हटी , ना राम मंदिर ही बना
कल मदारी थे , वही निकले मदारी आज भी
लूटकर माल्या भगा , चंपत हुए नीरव कई,
दंग हूँ मैं देखकर काला बजारी आज भी
रेप , शोषण और हत्या सुर्खियों में रोज हैं
कुछ नहीं बदला यहाँ,सब कुछ है' जारी आज भी
- विनोद निर्भय
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शुक्रवार, 8 जून 2018
तुम्हें अपना हृदय उसको दिखाना ही नहीं आया
तुम्हें अपना हृदय उसको दिखाना ही नहीं आया
मुहब्बत है, मगर होठों पे लाना भी नहीं आया
कई अवसर दिए उसने तुम्हें इज़हार करने के,
मगर तुमको कोई अवसर भुनाना भी नहीं आया
यहाँ तो पीठ पीछे लोग क्या-क्या कह गुज़रते हैं,
तुम्हें अफ़वाह को हँसकर उड़ाना भी नहीं आया
अकेला कल मुझे मझधार में तुम छोड़ आये थे,
सलीके से तुम्हें बातें बनाना भी नहीं आया
तेरे किरदार में कोई कमी दिखती नहीं 'निर्भय'
कमी बस है, तुम्हें चर्चे में आना ही नहीं आया
-
विनोद निर्भय
मुहब्बत है, मगर होठों पे लाना भी नहीं आया
कई अवसर दिए उसने तुम्हें इज़हार करने के,
मगर तुमको कोई अवसर भुनाना भी नहीं आया
यहाँ तो पीठ पीछे लोग क्या-क्या कह गुज़रते हैं,
तुम्हें अफ़वाह को हँसकर उड़ाना भी नहीं आया
अकेला कल मुझे मझधार में तुम छोड़ आये थे,
सलीके से तुम्हें बातें बनाना भी नहीं आया
तेरे किरदार में कोई कमी दिखती नहीं 'निर्भय'
कमी बस है, तुम्हें चर्चे में आना ही नहीं आया
-
विनोद निर्भय
बुधवार, 6 जून 2018
मंगलवार, 5 जून 2018
गंगा विष में ढल रही, सूरज उगले आग
गंगा विष में ढल रही , सूरज उगले आग
तप्त हिमालय हाँफता, अब तो प्राणी जाग
अब तो प्राणी जाग, देख दुनिया का मंजर
बृक्षमुक्त हैं खेत , और धरती है बंजर
कह 'निर्भय' समझाय , तभी तक जीवन चंगा
सहज-शुद्ध हो प्रकृति , धरा , माँ यमुना-गंगा
- विनोद निर्भय
तप्त हिमालय हाँफता, अब तो प्राणी जाग
अब तो प्राणी जाग, देख दुनिया का मंजर
बृक्षमुक्त हैं खेत , और धरती है बंजर
कह 'निर्भय' समझाय , तभी तक जीवन चंगा
सहज-शुद्ध हो प्रकृति , धरा , माँ यमुना-गंगा
- विनोद निर्भय
मंगलवार, 29 मई 2018
अकेला, कल मुझे मज़धार में जो छोड़ आये थे
अकेला, कल मुझे मज़धार में जो छोड़ आये थे,
ज़रा देखो, उन्हें बातें बनाना भी नहीं आता
- विनोद 'निर्भय'
ज़रा देखो, उन्हें बातें बनाना भी नहीं आता
- विनोद 'निर्भय'
मंगलवार, 22 मई 2018
शनिवार, 19 मई 2018
गुरुवार, 10 मई 2018
दोहा : हाथ, हाथ में थामकर
हाथ , हाथ में थामकर , शेर पढे दो-चार
रुठी थी तक़दीर पर, हँस दी सुनकर, यार!
रात अंधेरी डँस रही, 'निर्भय' करे पुकार
ऐ मेरी तक़दीर!तू , कब खोलेगी द्वार
हाथ,हाथ में थाम जब, चली साथ तक़दीर
दुश्मन तो दुश्मन यहाँ, अपनो को भी पीर
-विनोद निर्भय
रुठी थी तक़दीर पर, हँस दी सुनकर, यार!
रात अंधेरी डँस रही, 'निर्भय' करे पुकार
ऐ मेरी तक़दीर!तू , कब खोलेगी द्वार
हाथ,हाथ में थाम जब, चली साथ तक़दीर
दुश्मन तो दुश्मन यहाँ, अपनो को भी पीर
-विनोद निर्भय
बुधवार, 2 मई 2018
दिलों को जोड़कर नफ़रत मिटाने की ज़रुरत है
दिलों को जोड़कर नफ़रत मिटाने की ज़रुरत है
नया हो या पुराना ग़म , भुलाने की ज़रुरत है
कोई हिन्दू, कोई मुस्लिम यहाँ पर सिक्ख है कोई,
मगर ख़ुद को यहाँ इन्सां बनाने की ज़रुरत है
फ़कीरों, संत की धरती सदा मुझसे यही कहती,
स्वयं को बूँद से सागर बनाने की ज़रुरत है
सोमवार, 16 अप्रैल 2018
कभी इस पार की बातें
कभी इस पार की बातें ,कभी उस पार की बातें
चलो छोड़ो इन्हें !ये हैं महज़ बेकार की बातें
अभी मज़बूत करनी है पुरानी नींव को मिलकर
नहीं वाज़िब करे कोई नयी दीवार की बातें
- विनोद 'निर्भय'
चलो छोड़ो इन्हें !ये हैं महज़ बेकार की बातें
अभी मज़बूत करनी है पुरानी नींव को मिलकर
नहीं वाज़िब करे कोई नयी दीवार की बातें
- विनोद 'निर्भय'
शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018
शोख़-चंचल हवा की रवानी हो तुम
शोख़-चंचल हवा की रवानी हो तुम
एक दिलकश-हसीं रातरानी हो तुम
इस तरह से ख़ुदा ने तराशा तुम्हें
क्या कहूँ तुमसे कितनी सुहानी हो तुम
हर कोई चाहता है पढे ग़ौर से
सर से लेकर क़दम तक कहानी हो तुम
मुश्तहर हो ज़माने में तुम आजकल
हुश्न के मुल्क की राजधानी हो तुम
आज 'निर्भय' को तुझमें ख़ुदा मिल गया
लग रहा जैसे आँखों का पानी हो तुम
- विनोद 'निर्भय'
शुक्रवार, 26 जनवरी 2018
अनेक पंथ के गहनों का है घड़ा भारत
" भारत "
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प्रकृति की गोद में खेला,हुआ बड़ा भारत
युगों की याद समेंटे, अभी खड़ा भारत
कबीर , बुद्ध , दयानन्द , जायसी , नानक
अनेक पंथ के गहनों का है घड़ा भारत
सुभाष चन्द्र ने ललकार कर पुकारा तो,
लहू को हाथ में लेकर के चल पड़ा भारत
भगत था नाम, क्रुर राजतंत्र को खटका
उसी की सोच थी, चट्टान बन अड़ा भारत
अहिंसा-सत्य का परचम उठा लिया 'निर्भय'
चला तो फिर कभी पीछे नहीं मुड़ा भारत
- विनोद 'निर्भय'
शनिवार, 20 जनवरी 2018
यहाँ नसीब से मिला क्या है?
मुक्तक
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यहाँ नसीब से मिला क्या है?
नहीं मिला,तो फिर गिला क्या है?
तलाश अब तलक मुझे तेरी,
पता नहीं ये सिलसिला क्या है?
- विनोद 'निर्भय'
शुक्रवार, 12 जनवरी 2018
जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई
'गीत'
विनोद 'निर्भय
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जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई
रग-रग में लहू बनकर लहरा रहा है कोई
ख़ामोश थी ये धड़कन, तन्हाईयों में गुम थी
ख़ामोश धड़कनों को धड़का रहा है कोई
ऐ आसमाँ! बता दे, क्यूँ बूँद गिर रही है
रितुएँ बदल गयीं या यूँहीं बरस पड़ी हैंपत्थर से आज दिल को धड़का रहा है कोई
जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई
ओले ये पड़ रहे या बरसात आ रही है
दिल के चमन पे दिल से बौछार आ रही है
मन को बसंत-रितु में बहँका रहा है कोई
जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई
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बुधवार, 10 जनवरी 2018
न जाओ दूर यूँ, हमदम!अभी कुछ बात बाकी है
न जाओ दूर यूँ, हमदम!अभी कुछ बात बाकी है
हमारे इश्क़ की पूरी सुहानी रात बाकी है
रहो आगोश में यूँहीं,करुँ दीदार मैं तेरा
अभी अरमां अघूरे हैं, अभी जज़्बात बाकी है
- विनोद 'निर्भय'
हमारे इश्क़ की पूरी सुहानी रात बाकी है
रहो आगोश में यूँहीं,करुँ दीदार मैं तेरा
अभी अरमां अघूरे हैं, अभी जज़्बात बाकी है
- विनोद 'निर्भय'
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हमारे बीच सिलसिला क्या है
हमारे बीच सिलसिला क्या है| नहीं पता तो फिर पता क्या है|| नसीब आपका पढा हमने, कहो तो बोल दूँ लिखा क्या है| ...
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(1) लाख टके की बात है , समझो मेरे यार| धन से बस ख़ुशियाँ मिलें,मुश्किल पाना प्यार|| मुश्किल पाना...
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" भारत " ------------ प्रकृति की गोद में खेला,हुआ बड़ा भारत युगों की याद समेंटे, ...







