रविवार, 21 अक्टूबर 2018

कहा था कृष्ण ने,अर्जुन! यही है सार जीवन का

किसी  संघर्ष  में  पल-पल  हमारे   पास   होता है|

वही तो  ज़िन्दगी में शख़्स अपना  ख़ास  होता है||


भले  ही  ख़ून के रिश्ते निभाते अहमियत  लेकिन,

वही  सम्बन्ध  सच्चे  हैं  जहाँ एहसास   होता  है|


जहाँ भी  मंथरा-शकुनी  जमाकर   पाँव  रख देते,

वहाँ  तो राम  जैसों  का  सदा वनवास   होता  है||


हज़ारों    जंग   ऐसी   जीतने   से हारना    अच्छा,

विजय के  बाद जिसमें क्षोभ का आभास होता है|


कहा था  कृष्ण ने,अर्जुन!यही है सार  जीवन  का,

सभी निष्काम कर्मों  में  ख़ुशी का  वास  होता है||


 

                         - विनोद निर्भय

सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

लहूँ की डोर भी बेशक निभाती अहमियत लेकिन,

वही  सम्बन्ध  टिकते  हैं  जहाँ एहसास  होता है||


                         
      - विनोद निर्भय

बुधवार, 26 सितंबर 2018

इस तरफ आँधी,उधर सैलाब भी : मुक्तक

इस   तरफ   आँधी , उधर   सैलाब  भी|

और    नयनों   में  सुनहरा   ख़्वाब  भी||

आँख   का   पानी   मरा है   जब  कहीं,

सूख    जाते     हैं   नदी  -  तालाब  भी|


              - विनोद  'निर्भय'

सोमवार, 24 सितंबर 2018

हज़ारों जंग ऐसी जीतने से हारना बेहतर : शेेर

हज़ारों    जंग  ऐसी   जीतने  से  हारना  बेहतर,

विजय के बाद जिसमें हार का एहसास होता हो


                                 - विनोद 'निर्भय'

रविवार, 5 अगस्त 2018

कहीं सूरज चमकता तो कहीं काली धटाएँ हैं

कहीं   सूरज  चमकता  तो कहीं काली  घटाएँ   हैं|

यही  दो   ज़िन्दगी   की  ख़ूबसूरत  सी  अदाएँ  हैं||

किसी के पास दौलत है, किसी के पास है शोहरत,

किसी  के  पास  पूँजी  में  महज़ दोनों भुजाएँ   हैं|



                                           - विनोद निर्भय

सोमवार, 23 जुलाई 2018

कभी ख़ुद में उलझकर

कभी ख़ुद में उलझकर,दिल चटककर के बिखर जाता 

वहीं   ख़ुद  पे अगर  आए, नया  कुछ  कर दिखाता  है 




                                   - विनोद निर्भय 

शनिवार, 21 जुलाई 2018

दुनिया भी एक तमाशा है

दुनियाँ   अब एक तमाशा है 

स्वारथ  ही जिसकी भाषा है 

हर ओर  मची  है होंड़  यहाँ, 

धोखा   है ,  दर्द -हताशा  है 


         - विनोद निर्भय 

शनिवार, 14 जुलाई 2018

हसीं एहसास बनकर के जिगर में तुम समाये हो

हसीं एहसास  बनकर के  जिगर में तुम समाये हो 

मुझे  इतना  बताओ  तो, हक़ीक़त हो कि साये हो 

मेरे   हमराज़ ! दिल में है तुम्हारे प्यार  की   ख़ुश्बू,

युगों   से   था  निरा पत्थर, शिवाला तुम बनाये हो



                          - विनोद निर्भय 

मेरी साँसों में रहते हो, जिगर में तुम समाये हो

मेरी  साँसों  में  रहते  हो, जिगर में तुम समाये हो 

मुझे ये तो  बताओ तुम, हक़ीक़त हो कि साये हो 

मेरे  मेहबूब ! मुझमें है  तेरे एहसास   की   ख़ुश्बू,

मेरा  दिल  था निरा पत्थर, शिवाला तुम बनाये हो



                      - विनोद निर्भय 

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

दिखाने को भले वो ज़ख़्म पे मरहम लगाता है

दिखाने  को भले ही ज़ख़्म पर मरहम  लगाता  है
मुझे   लाचार  जब   देखे , नहीं  फूला  समाता  है
तिकड़मी-जालसाज़ों की क़दर है आज दुनियाँ में,
खरी-खोटी  वही  सुनता  यहाँ जो सच  बताता है

                    - विनोद निर्भय 

शनिवार, 23 जून 2018

हर शहादत पर पुराना मौन जारी आज भी

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हर   शहादत  पर   पुराना  मौन जारी  आज  भी
सैनिकों  के  पीठ  पर  चलती कटारी   आज  भी

''देश  को   झुकने  नहीं  दूंगा'', ये दावा  आम  था
पर   हक़ीकत  है  यहाँ   दावे  पे' भारी  आज भी

तीन   सौ   सत्तर  हटी , ना  राम मंदिर   ही   बना
कल   मदारी  थे ,  वही  निकले मदारी  आज  भी

लूटकर   माल्या    भगा  , चंपत हुए   नीरव  कई,
दंग   हूँ   मैं    देखकर   काला बजारी  आज  भी

रेप , शोषण   और    हत्या  सुर्खियों   में  रोज  हैं
कुछ नहीं बदला यहाँ,सब कुछ है' जारी आज भी

                             - विनोद निर्भय 


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शुक्रवार, 8 जून 2018

तुम्हें अपना हृदय उसको दिखाना ही नहीं आया

तुम्हें अपना हृदय उसको दिखाना ही नहीं आया
मुहब्बत  है, मगर  होठों पे लाना  भी नहीं आया

कई अवसर  दिए  उसने  तुम्हें इज़हार  करने के,
मगर तुमको कोई अवसर भुनाना भी नहीं आया

यहाँ तो पीठ पीछे लोग क्या-क्या कह गुज़रते हैं,
तुम्हें अफ़वाह को हँसकर उड़ाना भी नहीं आया

अकेला कल  मुझे मझधार में तुम छोड़ आये थे,
सलीके  से  तुम्हें   बातें   बनाना भी  नहीं आया

तेरे   किरदार  में कोई  कमी दिखती नहीं 'निर्भय'
कमी  बस है, तुम्हें चर्चे  में आना ही नहीं  आया


                            
विनोद निर्भय 

बुधवार, 6 जून 2018

प्यार का रंग दिल पे चढा इस क़दर

प्यार का रंग दिल पे चढा इस क़दर
हर कहीं  आ  रही है मुझे वो नज़र
आजकल दिन गुज़रता नहीं है मेरा,
नींद   आती  नहीं  है  मुझे  रातभर

                       - विनोद निर्भय 


                 

मंगलवार, 5 जून 2018

गंगा विष में ढल रही, सूरज उगले आग

गंगा   विष   में  ढल   रही , सूरज उगले  आग
तप्त  हिमालय  हाँफता,  अब  तो प्राणी  जाग
अब तो  प्राणी  जाग, देख दुनिया   का   मंजर
बृक्षमुक्त    हैं    खेत  , और   धरती  है   बंजर
कह 'निर्भय'  समझाय , तभी तक जीवन चंगा
सहज-शुद्ध  हो  प्रकृति , धरा , माँ यमुना-गंगा


                               - विनोद निर्भय 

मंगलवार, 29 मई 2018

अकेला, कल मुझे मज़धार में जो छोड़ आये थे

अकेला, कल मुझे मज़धार में जो छोड़ आये थे,
ज़रा देखो, उन्हें   बातें  बनाना   भी  नहीं आता

                        - विनोद 'निर्भय'

मंगलवार, 22 मई 2018

यहाँ तो पीठ पीछे लोग क्या-क्या कह गुज़रते हैं


                     



यहाँ तो पीठ पीछे लोग क्या-क्या कह गुज़रते हैं
मुझे अफ़वाह को दिल से लगाना ही नहीं आया


                            - विनोद निर्भय 

दुनिया की इस मूर्ति को, देखा करके ग़ौर


                    "कुण्डलिया"

दुनिया  की   इस  मूर्ति   को ,देखा करके ग़ौर
पहले तो कुछ और थी, लेकिन अब कुछ और
लेकिन  अब कुछ और दलाली, लालच, धोखे
गीदड़   फेंके    जाल, शेर   का   रस्ता   रोके
सम्बन्धों   का  तौल, करे  बनकर  के  बनिया
उतनी  सीधी नहीं, कि जितनी दिखती दुनिया


                             - विनोद निर्भय 

शनिवार, 19 मई 2018

विज्ञ-विवेका कह गये, ऊँची रक्खो सोच


               "कुण्डलिया"


विज्ञ-विवेका  कह  गये ,ऊँची  रक्खो  सोच
एक  लक्ष्य  लेकर  बढ़ो, बाकी  फेंको  नोच
बाकी  फेंको   नोच,लोच  मत रक्खो मन में 
निर्भयता   का फूल ,तभी खिलता जीवन में 
लक्ष्यहीन   हो   राह  ,चले   जो   देखी-देखा
उसका  जीवन व्यर्थ, कह गये विज्ञ - विवेका


                         - विनोद निर्भय 

गुरुवार, 10 मई 2018

दोहा : हाथ, हाथ में थामकर

हाथ , हाथ में  थामकर  , शेर पढे दो-चार
रुठी थी तक़दीर पर, हँस दी सुनकर, यार!

रात  अंधेरी डँस रही, 'निर्भय' करे पुकार
ऐ   मेरी  तक़दीर!तू , कब  खोलेगी  द्वार

हाथ,हाथ में थाम जब, चली साथ तक़दीर
दुश्मन तो दुश्मन यहाँ, अपनो  को भी पीर

                         -विनोद निर्भय 

बुधवार, 2 मई 2018

दिलों को जोड़कर नफ़रत मिटाने की ज़रुरत है

दिलों को  जोड़कर  नफ़रत  मिटाने की ज़रुरत है 
नया हो  या   पुराना  ग़म , भुलाने की  ज़रुरत  है

कोई हिन्दू, कोई मुस्लिम यहाँ पर सिक्ख है कोई,
मगर  ख़ुद  को  यहाँ  इन्सां  बनाने की ज़रुरत है

फ़कीरों,  संत की  धरती  सदा  मुझसे यही कहती,
स्वयं   को  बूँद   से  सागर  बनाने  की  ज़रुरत  है

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

कभी इस पार की बातें

कभी इस पार  की बातें ,कभी उस पार की बातें
चलो   छोड़ो   इन्हें !ये हैं  महज़  बेकार की बातें
अभी मज़बूत करनी  है पुरानी नींव को मिलकर
नहीं  वाज़िब   करे कोई  नयी   दीवार  की बातें

                              - विनोद 'निर्भय'

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

शोख़-चंचल हवा की रवानी हो तुम



शोख़-चंचल   हवा   की   रवानी  हो तुम
एक   दिलकश-हसीं   रातरानी   हो  तुम

इस   तरह   से   ख़ुदा   ने    तराशा तुम्हें
क्या   कहूँ तुमसे  कितनी सुहानी हो तुम

हर   कोई    चाहता   है   पढे   ग़ौर    से
सर से लेकर  क़दम  तक कहानी हो तुम

मुश्तहर   हो   ज़माने   में तुम  आजकल
हुश्न   के   मुल्क   की   राजधानी हो तुम

आज  'निर्भय' को तुझमें ख़ुदा मिल गया
लग   रहा  जैसे आँखों का  पानी हो तुम

                                - विनोद 'निर्भय'



शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

अनेक पंथ के गहनों का है घड़ा भारत


                 " भारत "
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प्रकृति की  गोद  में खेला,हुआ  बड़ा भारत
युगों  की  याद  समेंटे,  अभी  खड़ा  भारत

कबीर , बुद्ध ,  दयानन्द , जायसी  , नानक
अनेक  पंथ  के  गहनों का  है  घड़ा  भारत

सुभाष  चन्द्र ने  ललकार  कर   पुकारा  तो,
लहू को हाथ  में लेकर  के चल  पड़ा भारत

भगत  था  नाम, क्रुर  राजतंत्र  को  खटका
उसी  की  सोच थी, चट्टान  बन अड़ा भारत

अहिंसा-सत्य का परचम उठा लिया 'निर्भय'
चला तो फिर  कभी  पीछे नहीं मुड़ा  भारत

                                           - विनोद 'निर्भय'

शनिवार, 20 जनवरी 2018

यहाँ नसीब से मिला क्या है?



               मुक्तक

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     यहाँ नसीब से   मिला   क्या   है? 
     नहीं मिला,तो फिर गिला क्या है?
     तलाश   अब   तलक   मुझे तेरी, 
     पता नहीं ये   सिलसिला  क्या है?


                  - विनोद 'निर्भय'

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई

 

                      

                            'गीत'

   

      विनोद 'निर्भय

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जीवन में फूल  बनकर  महँका  रहा है कोई
रग-रग में लहू  बनकर  लहरा  रहा  है कोई
ख़ामोश थी ये धड़कन, तन्हाईयों में गुम थी
ख़ामोश धड़कनों को  धड़का  रहा  है कोई

               ऐ आसमाँ! बता   दे, क्यूँ बूँद  गिर   रही  है 
               रितुएँ बदल   गयीं  या  यूँहीं  बरस   पड़ी हैं
               पत्थर से आज दिल को धड़का रहा है कोई
               जीवन में  फूल  बनकर  महँका रहा है कोई

ओले ये  पड़ रहे  या  बरसात  आ   रही है
दिल के चमन पे दिल  से बौछार आ रही है
मन को बसंत-रितु में बहँका  रहा   है कोई
जीवन में फूल बनकर  महँका  रहा है कोई

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बुधवार, 10 जनवरी 2018

न जाओ दूर यूँ, हमदम!अभी कुछ बात बाकी है

न जाओ दूर यूँ, हमदम!अभी कुछ बात बाकी है
हमारे   इश्क़   की   पूरी   सुहानी  रात  बाकी है
रहो   आगोश   में    यूँहीं,करुँ   दीदार   मैं   तेरा
अभी अरमां अघूरे हैं, अभी   जज़्बात   बाकी है

                             - विनोद 'निर्भय'

हमारे बीच सिलसिला क्या है

हमारे  बीच  सिलसिला  क्या  है|  नहीं  पता तो  फिर पता क्या है|| नसीब    आपका     पढा   हमने, कहो तो  बोल  दूँ लिखा  क्या है|  ...