'गीत'
विनोद 'निर्भय
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जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई
रग-रग में लहू बनकर लहरा रहा है कोई
ख़ामोश थी ये धड़कन, तन्हाईयों में गुम थी
ख़ामोश धड़कनों को धड़का रहा है कोई
ऐ आसमाँ! बता दे, क्यूँ बूँद गिर रही है
रितुएँ बदल गयीं या यूँहीं बरस पड़ी हैंपत्थर से आज दिल को धड़का रहा है कोई
जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई
ओले ये पड़ रहे या बरसात आ रही है
दिल के चमन पे दिल से बौछार आ रही है
मन को बसंत-रितु में बहँका रहा है कोई
जीवन में फूल बनकर महँका रहा है कोई
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