हाथ , हाथ में थामकर , शेर पढे दो-चार
रुठी थी तक़दीर पर, हँस दी सुनकर, यार!
रात अंधेरी डँस रही, 'निर्भय' करे पुकार
ऐ मेरी तक़दीर!तू , कब खोलेगी द्वार
हाथ,हाथ में थाम जब, चली साथ तक़दीर
दुश्मन तो दुश्मन यहाँ, अपनो को भी पीर
-विनोद निर्भय
रुठी थी तक़दीर पर, हँस दी सुनकर, यार!
रात अंधेरी डँस रही, 'निर्भय' करे पुकार
ऐ मेरी तक़दीर!तू , कब खोलेगी द्वार
हाथ,हाथ में थाम जब, चली साथ तक़दीर
दुश्मन तो दुश्मन यहाँ, अपनो को भी पीर
-विनोद निर्भय
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