गुरुवार, 10 मई 2018

दोहा : हाथ, हाथ में थामकर

हाथ , हाथ में  थामकर  , शेर पढे दो-चार
रुठी थी तक़दीर पर, हँस दी सुनकर, यार!

रात  अंधेरी डँस रही, 'निर्भय' करे पुकार
ऐ   मेरी  तक़दीर!तू , कब  खोलेगी  द्वार

हाथ,हाथ में थाम जब, चली साथ तक़दीर
दुश्मन तो दुश्मन यहाँ, अपनो  को भी पीर

                         -विनोद निर्भय 

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