गंगा विष में ढल रही , सूरज उगले आग
तप्त हिमालय हाँफता, अब तो प्राणी जाग
अब तो प्राणी जाग, देख दुनिया का मंजर
बृक्षमुक्त हैं खेत , और धरती है बंजर
कह 'निर्भय' समझाय , तभी तक जीवन चंगा
सहज-शुद्ध हो प्रकृति , धरा , माँ यमुना-गंगा
- विनोद निर्भय
तप्त हिमालय हाँफता, अब तो प्राणी जाग
अब तो प्राणी जाग, देख दुनिया का मंजर
बृक्षमुक्त हैं खेत , और धरती है बंजर
कह 'निर्भय' समझाय , तभी तक जीवन चंगा
सहज-शुद्ध हो प्रकृति , धरा , माँ यमुना-गंगा
- विनोद निर्भय
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