मंगलवार, 5 जून 2018

गंगा विष में ढल रही, सूरज उगले आग

गंगा   विष   में  ढल   रही , सूरज उगले  आग
तप्त  हिमालय  हाँफता,  अब  तो प्राणी  जाग
अब तो  प्राणी  जाग, देख दुनिया   का   मंजर
बृक्षमुक्त    हैं    खेत  , और   धरती  है   बंजर
कह 'निर्भय'  समझाय , तभी तक जीवन चंगा
सहज-शुद्ध  हो  प्रकृति , धरा , माँ यमुना-गंगा


                               - विनोद निर्भय 

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