ग़ज़ल
सभी करते कहाँ मिलकर पहल कोई, ज़रा सोचो|
किसी की लाज लुटती है,सजग कोई, ज़रा सोचो||
महज़ बारह बरस का है ,मिला कल एक होटल में,
यही केतल उठाने की उमर कोई , ज़रा सोचो|
मिलेंगे मित्र लाखों पास शोहरत-ठाठ हो जिनके,
बुरे हालात पे खाता तरस कोई , ज़रा सोचो||
फ़लक पे धुंध का मतलब ज़मीं पे आग है माना,
उठी है आग तो होगी वजह कोई, ज़रा सोचो|
मटन-दारु थमाते ही कहा मुखिया इलेक्शन में,
जिताने का करो फिर से जतन कोई , ज़रा सोचो||
गुरु जी यूँ सुनाते थे व्यथा दौर-ए-शहादत की,
झपकती थी कहाँ सुनकर पलक कोई, ज़रा सोचो|
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