शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

सभी करके कहाँ मिलकर पहल कोई

ग़ज़ल

सभी  करते  कहाँ  मिलकर पहल कोई, ज़रा सोचो|
किसी  की  लाज लुटती है,सजग कोई, ज़रा सोचो||  

महज़ बारह  बरस का है  ,मिला कल एक होटल में,
यही   केतल  उठाने  की  उमर   कोई , ज़रा  सोचो| 

मिलेंगे  मित्र  लाखों  पास शोहरत-ठाठ  हो जिनके,
बुरे   हालात  पे   खाता   तरस  कोई , ज़रा  सोचो||

फ़लक  पे धुंध का  मतलब  ज़मीं  पे आग  है माना, 
उठी  है  आग  तो   होगी  वजह  कोई, ज़रा  सोचो| 

मटन-दारु  थमाते  ही   कहा  मुखिया  इलेक्शन  में,
जिताने का करो फिर से   जतन  कोई , ज़रा सोचो||

गुरु  जी  यूँ    सुनाते थे  व्यथा  दौर-ए-शहादत  की,
झपकती  थी कहाँ सुनकर पलक कोई, ज़रा सोचो|

                                  - विनोद 'निर्भय'


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