विनोद 'निर्भय'
---------------
हर लहर चोट पर चोट देती रही
माँ मेरी नाव को फिर भी खेती रही
रोज काजल लगाकरमेरे भाल पर
मुझसे मेरी बला छीन लेती रही
---------------
हर लहर चोट पर चोट देती रही
माँ मेरी नाव को फिर भी खेती रही
रोज काजल लगाकरमेरे भाल पर
मुझसे मेरी बला छीन लेती रही
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें